किस बात की बधाई दूँ. एक त्यौहार की या फिर जीव हत्या की. कहा गए वो सारे दावे जो आज अपने आप को एक इंसान कहते है. बात किसी एक मज़हब से ही नहीं जुडी है. आज बात हो रही है इंसानियत की वो इंसान जो हैवान बना हुआ है. बेजुबान जानवरों का क़त्ल अपने इंसान बनने का खोखला दावा कर कर रहे है हम लोग. क्या इसे खुदा, वाहे गुरु या भगवान माफ़ करेगा. शायद इसका जबाब किसी के पास नहीं है यह सब बहाने बाजी है. बात सिर्फ एक है की हम इंसानों की नीयत साफ़ नहीं है. आज इस पढ़े लिखे युग में हम इतने नीचे गिर चुके है कि जानवरों की बलि देकर अपनी खुशिया मन रहे है. क्या हमें ऐसे त्योहारों को मनाने का हक खुदा या भगवान ने दिया है? हम क्यों नहीं एक बकरीद को बकरे की बलि न देकर यह संकल्प ले कि इस दिन हम जीव हत्या नहीं करेंगे. और शुद्ध शाकाहारी मानव बन कर अपने खुदा या ईश्वर से जीवों के प्रति प्रेम पैदा कर आशीर्वाद लें. संभवतः यही आज की आवश्यकता है और इसी की बधाई स्वीकार करना चाहिए...
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