Thursday, November 17, 2011

"हमारा अवध"

                "हमारा अवध"

राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका॥
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥

दोहा- बरनाश्रम निज निज धरम बनिरत बेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥२०॥

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥


Saturday, November 5, 2011

इंसानियत और त्यौहार

किस बात की बधाई दूँ. एक त्यौहार की या फिर जीव हत्या की. कहा गए वो सारे दावे जो आज अपने आप को एक इंसान कहते है. बात किसी एक मज़हब से ही नहीं जुडी है. आज बात हो रही है इंसानियत की वो इंसान जो हैवान बना हुआ है. बेजुबान जानवरों का क़त्ल अपने इंसान बनने का खोखला दावा कर कर रहे है हम लोग. क्या इसे खुदा, वाहे गुरु या भगवान माफ़ करेगा. शायद इसका जबाब किसी के पास नहीं है यह सब बहाने बाजी है. बात सिर्फ एक है की हम इंसानों की नीयत साफ़ नहीं है. आज इस पढ़े लिखे युग में हम इतने नीचे गिर चुके है कि जानवरों की बलि देकर अपनी खुशिया मन रहे है. क्या हमें ऐसे त्योहारों को मनाने का हक खुदा या भगवान ने दिया है? हम क्यों नहीं एक बकरीद को बकरे की बलि न देकर यह संकल्प ले कि इस दिन हम जीव हत्या नहीं करेंगे. और शुद्ध शाकाहारी मानव बन कर अपने खुदा या ईश्वर से जीवों के प्रति प्रेम पैदा कर आशीर्वाद लें. संभवतः यही आज की आवश्यकता है और इसी की बधाई स्वीकार करना चाहिए...