Sunday, June 16, 2013

मेरे पिता जी "श्री हनुमान दत्त शुक्ल"



संक्षिप्त जीवन परिचय

नाम: श्री हनुमान दत्त शुक्ल
पिता का नाम: श्री त्रिभुवन दत्त शुक्ल
अंतिम दर्शन: २० अक्टूबर २०१२
स्थाई निवासी: ग्राम कंदई कलां (पूरे मनबोध शुक्ल) तहसील मिल्कीपुर जिला फैजाबाद उत्तर प्रदेश
शौक: सच्ची समाज सेवा, ईमानदारी व सत्यता का पालन.
पेशा: अध्यापन कार्य (प्राइमरी पाठशाला इब्राहिमपुर के हेड मास्टर से सेवा निवृत्त)
वैवाहिक स्थिति: विवाहित
सामाजिक पद व प्रतिष्ठा: निर्वाचित अध्यक्ष, ग्राम सभा बोड़ेपुर 
सामाजिक कार्य: अपने कार्यकाल के दौरान इब्राहिमपुर ग्राम में कन्या माध्यमिक विद्यालय की स्थापना.
भाषा का ज्ञान: हिन्दी, संस्कृत, उर्दू व अंग्रेजी





Monday, April 30, 2012

पुरानी वैवाहिक प्रथा पश्चात्यता को एक झटका

पुरानी वैवाहिक प्रथा पश्चात्यता को एक झटका

वैवाहिक प्रथा अत्यधिक सूझ बूझ कर बनाई गयी थी. यह प्रथा किसी राजनीतिज्ञ या विदेश में पढ़े किसी बड़े व्यक्ति के साहब जादे ने नहीं बनाई. भारत में कुछ ऐसे ही लोगो की नज़र पडी और बन बैठे भारत वर्ष के भाग्य विधाता. उन्होंने अपने मन मर्जी से नियमों और कानूनों की धज्जियाँ बखेड दी और लूट मार व सीधी सादी जनता को वेवकूफ बना कर बने नेताओं की मदद से मनमाने कानून बनाने शुरू किये. उन्होंने यह सोचा ही नहीं की जिस प्रथा को समाप्त कर रहे है उसका दूरगामी परिणाम क्या होगा. आज जब १४-१५ बर्ष में ही लोग वयस्क हो जा रहे है तो भारत में १८/२१ की उम्र रखने का क्या मतलब. इस उम्र में तो वैसे भी कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता. क्योकि हर व्यक्ति के अन्दर आगे बढ़ने की इच्छा अत्यधिक बढ़ जाती है और वह अपने परिवार या माँ बाप की इच्छा के विरूद्ध अगली मंजिल की तलाश में आगे बढ़ जाता है. जबकि मंजिल तक पहुँच पाने का प्रतिशत अत्यधिक कम हो जाता है. यदि कोई मंजिल मिली भी तो व्यक्ति को संतोष नहीं होता और मंजिल दर मंजिल भटकता रहता है. कुछ एक लोग अत्यधिक पैसा कमा लेते है. और भ्रष्ट भी बन जाते है. फिर उनसे कोई सीधा सादा परिवार रिश्ता नहीं जोड़ पाता. फलस्वरूप उनकी युवावस्था अनुचित व्यवस्था की तरफ जाने पर मजबूर कर देती है.

हमारे उत्तर प्रदेश में एक पूर्व प्रथा थी, जो इस प्रकार है. कन्या की उम्र १२ वर्ष पूरा होते ही वर ढूँढने का कार्य आरम्भ हो जाता था और अगले कुछ समय अंतराल यानी १३ या १४ में कन्या से १ या ३ वर्ष उम्र में बड़े वर के साथ विवाह संपन्न करा दिया जाता था. इस उम्र में वर कक्षा १० या १२ की शिक्षा में होता था. विवाह में कन्या की विदाई नहीं की जाती थी. वर और कन्या में वयस्कता को ध्यान में रखते हुए विवाह के १, ३, ५ या ७ वर्ष गौना कराया जाता था. इस दौरान शिक्षा भी पूर्ण हो जाती थी और रोजगार या नौकरी की भी व्यवस्था हो जाती थी. इस बीच वर और वधू दोनों एक दूसरे को समझने और बूझने भी लगते थे और आपसी प्रेम सम्बन्ध स्थापित कर लेते थे. दोनों में दूरी होने के साथ प्रेम सम्बन्ध मधुर हो जाते थे. हा एक और बात थी. चूंकि विवाह १०-१२ कक्षा में हो जाता था अत एव दहेज़ की मांग भी लगभग नहीं के बराबर होती थी. और अब तो रेट वर की स्थिति के अनुसार होती है.  प्रेम सम्बन्ध तो रोज नए बनते है और दूसरे दिन ही न्यायालय में तलाक में बदल जाते है. अपने बूढ़े माँ बाप और परिवार वालों की तो कोई सुनता ही नहीं. बेइज्जती होती है. यदि अपनी जाति धर्म या देश में विवाह किया तो वह गंवार कहलाता है.  ३०-३५ की उम्र में शादी करते है. इससे पहले इधर उधर नज़रें दौड़ते है. और ४५ में बड़ी मुश्किल से अगली पीढ़ी को जन्म देते है. बच्चा जवानी की दहलीज यानी १८-२१ पर कदम रखा ही नहीं की स्वयं स्वर्ग का टिकेट कटा लेते है. 

अब यह सोचना नयी पीढ़ी को है. अनुचित संबंधों में कमी कैसे आये. बहन बेटियाँ कैसे सुरक्षित रहे.  दहेज़ प्रथा को समाप्त कैसे किया जाय या फिर पश्चिमी सभ्यता को और हवा दी जाय.

Thursday, November 17, 2011

"हमारा अवध"

                "हमारा अवध"

राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका॥
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥

दोहा- बरनाश्रम निज निज धरम बनिरत बेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥२०॥

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥


Saturday, November 5, 2011

इंसानियत और त्यौहार

किस बात की बधाई दूँ. एक त्यौहार की या फिर जीव हत्या की. कहा गए वो सारे दावे जो आज अपने आप को एक इंसान कहते है. बात किसी एक मज़हब से ही नहीं जुडी है. आज बात हो रही है इंसानियत की वो इंसान जो हैवान बना हुआ है. बेजुबान जानवरों का क़त्ल अपने इंसान बनने का खोखला दावा कर कर रहे है हम लोग. क्या इसे खुदा, वाहे गुरु या भगवान माफ़ करेगा. शायद इसका जबाब किसी के पास नहीं है यह सब बहाने बाजी है. बात सिर्फ एक है की हम इंसानों की नीयत साफ़ नहीं है. आज इस पढ़े लिखे युग में हम इतने नीचे गिर चुके है कि जानवरों की बलि देकर अपनी खुशिया मन रहे है. क्या हमें ऐसे त्योहारों को मनाने का हक खुदा या भगवान ने दिया है? हम क्यों नहीं एक बकरीद को बकरे की बलि न देकर यह संकल्प ले कि इस दिन हम जीव हत्या नहीं करेंगे. और शुद्ध शाकाहारी मानव बन कर अपने खुदा या ईश्वर से जीवों के प्रति प्रेम पैदा कर आशीर्वाद लें. संभवतः यही आज की आवश्यकता है और इसी की बधाई स्वीकार करना चाहिए...