वैवाहिक प्रथा अत्यधिक सूझ बूझ कर बनाई गयी थी. यह प्रथा किसी राजनीतिज्ञ या विदेश में पढ़े किसी बड़े व्यक्ति के साहब जादे ने नहीं बनाई. भारत में कुछ ऐसे ही लोगो की नज़र पडी और बन बैठे भारत वर्ष के भाग्य विधाता. उन्होंने अपने मन मर्जी से नियमों और कानूनों की धज्जियाँ बखेड दी और लूट मार व सीधी सादी जनता को वेवकूफ बना कर बने नेताओं की मदद से मनमाने कानून बनाने शुरू किये. उन्होंने यह सोचा ही नहीं की जिस प्रथा को समाप्त कर रहे है उसका दूरगामी परिणाम क्या होगा. आज जब १४-१५ बर्ष में ही लोग वयस्क हो जा रहे है तो भारत में १८/२१ की उम्र रखने का क्या मतलब. इस उम्र में तो वैसे भी कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता. क्योकि हर व्यक्ति के अन्दर आगे बढ़ने की इच्छा अत्यधिक बढ़ जाती है और वह अपने परिवार या माँ बाप की इच्छा के विरूद्ध अगली मंजिल की तलाश में आगे बढ़ जाता है. जबकि मंजिल तक पहुँच पाने का प्रतिशत अत्यधिक कम हो जाता है. यदि कोई मंजिल मिली भी तो व्यक्ति को संतोष नहीं होता और मंजिल दर मंजिल भटकता रहता है. कुछ एक लोग अत्यधिक पैसा कमा लेते है. और भ्रष्ट भी बन जाते है. फिर उनसे कोई सीधा सादा परिवार रिश्ता नहीं जोड़ पाता. फलस्वरूप उनकी युवावस्था अनुचित व्यवस्था की तरफ जाने पर मजबूर कर देती है.
हमारे उत्तर प्रदेश में एक पूर्व प्रथा थी, जो इस प्रकार है. कन्या की उम्र १२ वर्ष पूरा होते ही वर ढूँढने का कार्य आरम्भ हो जाता था और अगले कुछ समय अंतराल यानी १३ या १४ में कन्या से १ या ३ वर्ष उम्र में बड़े वर के साथ विवाह संपन्न करा दिया जाता था. इस उम्र में वर कक्षा १० या १२ की शिक्षा में होता था. विवाह में कन्या की विदाई नहीं की जाती थी. वर और कन्या में वयस्कता को ध्यान में रखते हुए विवाह के १, ३, ५ या ७ वर्ष गौना कराया जाता था. इस दौरान शिक्षा भी पूर्ण हो जाती थी और रोजगार या नौकरी की भी व्यवस्था हो जाती थी. इस बीच वर और वधू दोनों एक दूसरे को समझने और बूझने भी लगते थे और आपसी प्रेम सम्बन्ध स्थापित कर लेते थे. दोनों में दूरी होने के साथ प्रेम सम्बन्ध मधुर हो जाते थे. हा एक और बात थी. चूंकि विवाह १०-१२ कक्षा में हो जाता था अत एव दहेज़ की मांग भी लगभग नहीं के बराबर होती थी. और अब तो रेट वर की स्थिति के अनुसार होती है. प्रेम सम्बन्ध तो रोज नए बनते है और दूसरे दिन ही न्यायालय में तलाक में बदल जाते है. अपने बूढ़े माँ बाप और परिवार वालों की तो कोई सुनता ही नहीं. बेइज्जती होती है. यदि अपनी जाति धर्म या देश में विवाह किया तो वह गंवार कहलाता है. ३०-३५ की उम्र में शादी करते है. इससे पहले इधर उधर नज़रें दौड़ते है. और ४५ में बड़ी मुश्किल से अगली पीढ़ी को जन्म देते है. बच्चा जवानी की दहलीज यानी १८-२१ पर कदम रखा ही नहीं की स्वयं स्वर्ग का टिकेट कटा लेते है.
अब यह सोचना नयी पीढ़ी को है. अनुचित संबंधों में कमी कैसे आये. बहन बेटियाँ कैसे सुरक्षित रहे. दहेज़ प्रथा को समाप्त कैसे किया जाय या फिर पश्चिमी सभ्यता को और हवा दी जाय.